तुम पियो तो जानिब, मेरे होश गुमाँ,
ख़ुश्क होती हुई, साँसो को तलब है,
तुम्हारे तर लबों पर, मिलतीं मयकदा,
और कहीं जाऊँ, आदत तो अजब है,
गुज़रता रहता हूँ, मैं आवाज़ के बिना,
अब तो कहने को बस, ये ही अदब है,
तेरे दरवाज़े पर, रखता चलूँ निगाह,
सुना है घर में बसा, मेरा ही वो रब है ।
गिरते हुए भी तुम पे, मालूम था सदा,
तुम्हारे आग़ोश में ही होने का सबब है,
‘सौरभ’ संभालो हुस्न, होते नहीं फ़िदा,
हमें फिर होश की आदत भी ग़ज़ब है ।।
हमसे ज़दा तुम्हारा साया भी अब है,
हमारे ग़ुरूर का, और क्या मतलब है ,
तुम पियो तो जानिब, मेरे होश गुमाँ,
ख़ुश्क होती हुई, साँसो को तलब है,
तुम्हारे तर लबों पर, मिलतीं मयकदा,
और कहीं जाऊँ, आदत तो अजब है,
गुज़रता रहता हूँ, मैं आवाज़ के बिना,
अब तो कहने को बस, ये ही अदब है,
तेरे दरवाज़े पर, रखता चलूँ निगाह,
सुना है घर में बसा, मेरा ही वो रब है ।
गिरते हुए भी तुम पे, मालूम था सदा,
तुम्हारे आग़ोश में ही होने का सबब है,
‘सौरभ’ संभालो हुस्न, होते नहीं फ़िदा,
हमें फिर होश की आदत भी ग़ज़ब है ।।

