छोटी सी, बौरा जाती है,
बार बार मचल जाती है,
नव पल्लव प्रेम पसारे,
तीनकों पर छा जाती है।
मंजरी मुग्धमयी मंजूषा
कोपल खिलखिलाती है
मंद स्वर में सारिका भी,
खनखनाती गुनगुनाती है।
तन के मन के कोने कोने,
छू छू कर बह जाती है,
पवन के तनिक वेग से,
पल में अकुला जाती है।
रसमाधुरी तरल भाव से,
संजीवन सी घुल जाती है,
‘सौरभ’ लघु अमृत जैसी,
बौराती है, खिल जाती है ।।

