क्या क्या सहते रहे हो

सरकार कोई हो, मिज़ाज वही हो

हथेली पर सरसों, की बात वही हो

बिकना आए तो आओ बिको तुम,

यह भर देखो की बस दाम सही हो,

 

हमें आज चौपाल पे ग़ुस्सा बड़ा है ,

फिर कैसे कैसों से, पाला पड़ा है,

जो उम्मीद थी की वो कुछ सुनेंगे,

वही आकर बोले, आवाज़ ‘नहीं’  हो,

 

बहुत बोझा बोझे, का रोते रहे हो,

बताते रहे, क्या क्या सहते रहे हो,

मालूम है फिर से तुम जीने लगोगे,

जीवन जीने की, बस चाह नयी हो ।

 

दफ़नाने की कोशिश, हर बार होगी,

बाज़ार में जब भी, ये सरकार होगी,

आँचल भी धरती का दरकता होगा,

शिखर सम्मान की, शिला ढही हो ।

 

उम्मीदें रोटियों की, देता एक चूल्हा,

बच्चों की मुस्कानें, देता कोई झूला,

निर्बाधा उड़ने को, वो नीला अम्बर,

बस इतना दो, बेटा बेटी, कोई हो ।

 

तुम भी बड़े सबके, वफ़ादार निकले,

हमनफ़ज बनकर, ख़रीदार निकले,

वादे जो अच्छे थे, दिखते सच्चे थे,

‘सौरभ’ बतलाओ, तुम भी वही हो ।।

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