गर्भ से जीवन साध लिया;
सृष्टि से सीधा संवाद किया,
पीड़ा पराकाष्ठ, जब उभरी,
धरती सा संयम बांध लिया;
पंकजा ! रचियता, तू उपवन,
विहारिणी वरण तू कण कण,
ज्योति जिव्या, आरती, रमण
तूने वसुधा को है साध्य जिया;
आरोहिणी अरुण बेला की,
निशा बिछा कर डोला की,
वरुणाई होकर जोअकुलाई,
करुणा से ही सिंघनाद किया;
पल्लवित हो के जो मुस्काई,
मंजरी मल्हार, हो कर गायी,
तृप्त, विभूषित, मन मृदुलाई,
यूँ युव-उर्वी का श्रृंगार किया;
ऋतु रतनाकर, हो मुक्त छंद
दिव्य- कंचन, कनक, सवृन्द
दीपिका रजनी के उर आनंद,
दिव्य धरा धरोहर सार किया;
विजयीश्री भाव से भोर हुयी,
राजवती तू भावविभोर हुयी,
देशना सुन जो किशोर हुयी,
तो जया को अंगीकार किया;
अनुप्रिया हुयी, भई परछाईं,
वियोम हुयी सब पर छायी,
जो मधुर मिलन पर शर्मायी,
वसुधा को भी निखार दिया;
नमनीय रुचिका आत्म तुम्हीं,
भावना मनुज भव्यात्मा तुम्हीं
श्रुति सद्गुण अध्यात्म तुम्ही,
जननी जनन, आराध्य किया;
नक्षत्र नयन, सदान्दित राशि,
नभगामी, कणिका अभिलाषी,
स्वर्णसुधा सी प्रज्ञा, प्राण बसी,
भू मंडल सारा, उद्धार किया;
राजश्रेय मनुज की धर्मध्वजा,
स्वाभावज निज, उत्सर्ग स्वतः
शुभ-स्तन पोषित जग उपजा,
‘सौरभ’ नारी ने ब्रम्हांड जिया…
जब उसने ..
गर्भ से जीवन साध लिया….

