चलो ज़रा सा, चमन चुराएँ..
ना मेरे मन का,
ना तेरे मन का,
जो सबका है, वो गगन छुड़ाएँ..
चलो ज़रा सा, चमन चुराएँ…
बादलों, क्यों बरस लगे हैं,
कयी हैं जो कि तरस रहे हैं,
बूँद बूँद भी ना, बरस रहे हैं,
जो हो सके तो गगन चुआएँ,
चलो ज़रा सा, चमन चुराएँ..
बड़ा जले हो, अब थाम लो,
तपन अपनी, अब जान लो,
सूरज तुम भी ज़रा शाम लो,
थाम के किरणें, अहम बुझाएँ..
चलो ज़रा सा, चमन चुराएँ..
मुक्त हुआ मन, बता कहाँ है,
उड़ा कहाँ तक, पता कहाँ है,
भँवरजाल सब, पता कहाँ है,
बिना फँसे ही, लगन लगाएँ..
चलो ज़रा सा, चमन चुराएँ..
गुलों की रंगत बदल रही है,
वो साजो़-संगत बदल रही है,
कुशों की चाहत, बदल रही है,
लहरायें, बादल को गुदगुदाएँ…
चलो ज़रा सा, चमन चुराएँ..
सघन हो पर, हो कहाँ पर,
मगन हो पर, अहं कहाँ पर?
उद्विग्न हो के पिघल वहाँ पर,
बैठा जहाँ कोई नयन लगाए….
चलो ज़रा सा, चमन चुराएँ..
गर्म हवा क्यों, बहा बहा कर,
जड़ों को ही, सुखा सुखा कर,
पूँछती टहनियाँ, पत्ते गिरा कर
क्यों ओस की बूँदों में मन बसाएँ..?
चलो ज़रा सा, चमन चुराएँ..
सरल कहाँ है, असल कहाँ है,
गगन भी इतना, तरल कहाँ है,
‘सौरभ’ जो इतना मचल रहा है
तो आसमान को पकड़ हिलाएँ..
चलो ज़रा सा, चमन चुराएँ..

