छू आयी है…..

छू आयी है उन कणों को,

जो गहरे छिपे हुए सुरम्य,

नरम से आकाश में बहते,

कभी ललिमा के से लाल,

या घन गहरे घुले कत्थयी,

या फिर सुरमयी रजनी को,

धुल कर, बिखरते जाते हैं,

 

छू आयी है उन कणों को,

जो व्यापित हो चेतना में,

अपनी कोमल डंठलों से,

जल कण का कर प्रसार,

कोपलों को कर विस्तार,

कमल मण्डल के द्वार से,

सूर्य को दण्डवत करते है ।

 

छू आयी है उन कणों को,

मंद मलय की स्वाँस पर,

चढ़ कर, मुग्धमय नवयुवा,

तुम्हारी अधचेतन मुस्कान,

जो स्पर्श कर कणिकायित,

चैतन्य चित, उमंग विभोर कर

प्रभात हृदय पर फहराते हैं ।

 

‘सौरभ’ यह मृदु मुस्कान,

छू आयी है उन कणों को,

जो हर्ष, तरंग, चेतनामय,

आभास संग प्रसार पर हैं ….।।

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