लो भाई
दोस्तों ने बिगाड़ कर हर बार, ये कहा;
इसके सुधरने का अब सवाल ही कहाँ ?
हर साल तुमसे मिल के वादा कर गए,
इस साल तेरे साये से दूर ही होंगे हम,
ऐसी बंदिशो से तूने जकड़ा है रूह को,
ये साल भी तेरी, सोहबत में निकल गया ।
तक़दीर का लिखा पन्ना, तेरी किताब में,
मेरा लिखा हर हर्फ़, जफ़ा है, हिसाब में,
ख़ंजर क़लम बना, जिगर ज़ब्त हर पहर,
जो दिल में उतर आया, ख़ूँ ही बहा दिया,
देखते जो हम कहीं रूहे-नज़र खलक,
कुंडियों को तोड़, खिड़कियों से फ़लक,
‘सौरभ’ इस साल सोचा की नज़र चढ़ें,
इस बरस भी दोस्ती का चश्मा चढ़ा लिया ।।

