प्रकृति का सार

चलो बनाएँ ..

जो बहती बिना थकान,

स्वच्छ हवा लिए मुस्कान,

चिड़ियों की ऊँची उड़ान,

साफ़ सा खुला आसमान..

 

चलो बनाएँ ..

बुलबुल चहकती हर सुबह,

कोयल गाती हो तरह तरह,

फलों से झुका, लदा भरा,

पेड़ ऊँचे पर हर पत्ता हरा..

 

चलो बनाएँ ….

हिम से पूरा छिपा ढका,

सफ़ेद दूध जिससे चढ़ा,

सर तान कर रहा खड़ा,

एक विशाल पर्वत बड़ा…

 

चलो बनाएँ …

मनभावन सुंदर सा वन,

झरनों को जगाता सावन,

जल नदियाँ अतिपावन,

सींचती धरती का आँगन,

 

चलो बनाएँ …

चित्र नहीं.. पर संजीव यहीं,

सृष्टि का मीठा संगीत यहीं,

मानवता का जो मीत यहीं,

तृप्ति से धरा की जीत यहीं,

‘सौरभ’ कर लें ध्यान सभी,

प्रकृति से जीवन डोर सधी…

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