ख़ुशबू यहाँ.. क्यों आ गयी,
क्यों फ़ासले.. ये महका गयीं,
तुम दूर थे,.. पता ना चला..
यादें तेरी जो, आसपास थीं ..
तकिए पे जो, मूँदी आँख थी,
तकिया जगा हुआ, है आज भी
बालों में सजे, गज़रे की महक,
शानों में बसी, ..कुछ ख़ास थी ।
तुम दूर थे,.. पता ना चला..
यादें तेरी जो, आसपास थीं..
कजरी तेरी, ही आँख की,
फैली जहाँ, मेरी बाँह थी,
बादल उठे, सब ओर से,
मिट्टी में बसी, बरसात थी ..
तुम दूर थे,.. पता ना चला..
यादें तेरी जो, आसपास थीं …
कह के गये, भुला दो हमें,
और बाग़ में, सुला दो हमें,
‘सौरभ’ हुए, की हवा हो गये,
ले कर उड़े वो, जो बहका गयी..

