मशालों को जगाना, आसान तो न था,
इन तूफानों में रौशनी को बचाऊं कैसे ?
तंग गलिओं से गुजरते हैं यह अँधे रस्ते,
रौशन जज़्बों को मंजिल पे ले जाऊँ कैसे ?
रोज खिलतीं हैं जो हवाओं में कलियाँ,
उनको उनसे मुक़म्मल हो मिलाऊँ कैसे ?
जो कहीं आग बरसों बसी हो दिल में,
उनसे फिर इन चरागों को जलाऊँ कैसे ?
लो जरा थामो नन्हें हाथों को इस बरस,
जो पूछते हो हर बरस कि, हँसाऊँ कैसे?
इतने सालों से जो ख्वाबों में बढ़ा होगा,
अब हक़ीक़त को हौसलों से मिलाऊँ कैसे ?
बदलता रहता है तू भी, समय की तरह,
जो रहगुज़र को ख़ुदा भी, बनाऊँ कैसे ?
तेरी रूह से इस कदर मिलता ‘सौरभ’
ख़ुदाई यूँ, रौशन कर के, बताऊँ ‘ऎसे’ II

