मिलकर मिसाल गढ़ते है

चलो मिलकर मिसाल गढ़ते है,

कुछ तुम करो, कुछ हम करते हैं,

क़त्ल भी आधा, आधा, ही करके,

ज़िंदगी को ही, बेहाल करते हैं।

 

क्या कहीं से है कोई, मुस्कुराया,

पता करो कि वो, कहाँ से है आया,

उसे दस्तूर बताओ, यहाँ का ज़रा कि,

रोने वालों का ही, इस्तक़बाल करते है ।

 

क़ायदे अपने ज़रा, यूँ संभाल रखना,

हुज़ूर की हुज़ूरी में, फ़िलहाल रखना,

स्याह रंग ख़ून का हर कोई है प्यासा,

क़ायदे से ही, ज़ुबानें लाल करते हैं ।

 

चंद साँसें भी तुमको मिल गयीं कैसे?

ये बंद थीं तो खुलीं, खिड़कियाँ कैसे ?

उन हवाओं का रूख मोड़ दो फिर से,

वो क्यों हुकूमत से, सवाल करते हैं ?

 

तुम कौन हो ? मुंतज़िर किसके हो,

चलो जाओ ! मुख़्तसर से किस्से हो,

भाड़ में फूटते हुए, तुम बस छिटको,

भड़भूजे जब तवे को लाल करते है ।

 

काग़ज़ों पर लिख कर के बोल दिया,

चलो तुमने भी सब राज़ खोल दिया,

अब बाक़ी रह ना पाए उम्मीद कोई,

ज़िन्दगी इस क़दर, मुहाल करते हैं ।

 

चुप रह कर भी वो क्यों चुप नहीं रहते,

धड़कनों का बोलना, कहीं नहीं सहते,

बेइरादा ही दिल खोल कर रख देते हैं,

सौरभ भी क्या क्या बवाल करते हैं ।

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