वो अक्स कहाँ, जो मेरी मुझसे बात करा पाए,
वो शख़्स कहाँ, जो बिन बोले कितनी बात बता जाए,
पँखों में दम कितना होता, यह पता नहीं इस पंछी को,
हो आसमान में छेद कहाँ तक, कोई तो बतला जाए
दरख़्त कहाँ जो छांव भी दे, और हौसला रास्ते का,
झाड़ के पत्ते अपने तन के, रौशन रातें कर जाए,
नर्म हवा के झोकें वो, जब सहलाएँ इन चोटों को,
रगड़ हथेलियाँ गर्म करें, दर्द को फिर सेंका जाए,
ऐसा थानेदार मिला है, शहर को काफ़ी बरसों में,
खोल के खिड़की दरवाज़े सब, चलो अब सोया जाए,
किससे-विस्से जोड़ जाड़ के, जो नयी कहानी बतलाएँ,
नया पुराना सोच समझ के, वो सबक़ नया सिखला जाए,
‘सौरभ’ जो सुनता सारी बातें, सुनकर बातें रख लेता,
ऐसा वक़्त कहाँ, जो बीत गया हो पर फिर से आए ।

