वो फिर से बुलाते हैं हमको..
कुछ मीठे बोलों वाले गाँव,
ठंडी नीम की हिलती छाँव,
तालाब में बहती चप्पू नाँव,
सुबह शाम बस चाँव-चाँव,
काग़ज़ी रिवाल्वर ठाँव-ठाँव,
गिलहरी से फुदके नंगे पाँव,
भारी दोपहरी, शीतल गाँव
वो फिर से बुलाते हैं हमको..
वो फिर से बुलाते हैं हमको..
भागम भाग, पकड़म पकड़ाई,
ऊँचम ऊँच और छुपन छुपायी
कड़क कोड़ा है जवान शाही,
विष-अमृत की दौड़ दौड़ायी,
कँचों पर होती, वही लड़ायी,
डंडे से गिल्ली की वो पिटायी,
झगड़ा तगड़ा पर मान मनायी,
वो फिर से बुलाते हैं हमको..
वो फिर से बुलाते हैं हमको..
जले दूध की, मीठी मिठाई,
खट्टी इमली, गुड़ की सिंवई,
भुजा भुनती रघुवा की मायी,
भट्टों की कोयले पे सिकायीं,
जामुन के नीचे आस लगायी,
अमियाँ की आपस में बँटायी,
राब की मस्ती, चढ़ी कढ़ाही,
वो फिर से बुलाते हैं हमको..
वो फिर से बुलाते हैं हमको..
खप्पर की छत पर धीरे चलना,
भरी दोपहरी, फुदक उछलना,
सूरज से पहले, मैदान निगलना,
ट्यूबवेल के पानी में फिसलना,
मेढ़ों पर हाथ फैला के टहलना,
छोटी छोटी बातों पर बहलना,
बर्फ़ की क़ुल्फ़ी पर, पिघलना,
वो फिर से बुलाते हैं हमको..
वो फिर से बुलाते हैं हमको..
मकरंद सुरों का क्या भेद, बतलाने,
मिट्टी की मुहब्बत, हमसे जतलाने,
मुक्त हृदय की, धड़कन, सुनवाने,
फिर लौटाने को, स्वच्छंद मुस्कानें,
सृष्टि की सरल भाषा, से मिलवाने,
जीवन में जीवन ज्योति, दिखलाने,
हमको बुलाते हैं ‘सौरभ’ यह सब,
हमको बस हमसे ही, मिलवाने.. ।

