सही और गलत को नापता हूँ

सही और ग़लत के बीच;

नापता हूँ, तो फ़ासला नहीं मिलता,

मिलता है तो बस कि

हवा किस ओर को बह रही है,

किस तरफ़ से रूख कर के,

कौन सी उम्मीदों के साथ,

जी रहा हूँ मैं, ये पूछते हुए,

रात अभी कितनी और गहरी है,

झूठ और सच के पास में,

कितने गवाह हैं, जो खड़े हैं,

मुस्तैदी के साथ, जान कर,

की जमात कितनी बहरी है,

ग़लत तुम भी हो, हम भी,

सही तुम भी नहीं, हम भी,

सच की चाल कभी ना थी,

वो रूठ कर बस, कह रही है,

हममें सही जब कोई नहीं,

ग़लत का पता भी तो नहीं,

मान लो तुम आँखों की बात,

बाक़ी बिसात है, बड़ी गहरी है ।

‘सौरभ’ सही और ग़लत के बीच;

नापता हूँ, तो फ़ासला नहीं मिलता,

मिलती है तो बस एक भूख,

जो ना जाने कब से वहीं ठहरी है ।।

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