ग़ौर से देखो तो फिर नज़र आएगी,
दरमियाँ दफ़्न है, क्यों दिखलाएगी;
ख़ूबसूरती तो काफ़िर ही कहलाएगी,
जो बचा के ख़ुद को ही रख पाएगी;
जो हुज़ूर के हुज़रे में पड़ा हो हरदम,
उसके अंदर भी जुदाई ही नज़र आएगी;
जो वो चेहरे के लकीरें ही पढ़ा करते हैं,
‘सौरभ’ कब ग़ुबार मेरा समझ पायेंगी ।

