प्रेम परिभाषा के परे
रोज देखता हूँ,
कभी दबे पाँव आकर,
चुपके से मेरी आँखों को
अपनी हथेलियों में छिपाकर,
मासूम सा पूछता है,
ख़ुद को महसूस कराकर,
बता मैं कौन हूँ ?
मैं भी कहता हूँ मुस्कुराकर,
तुम.. तुम वही हो जो रोज़,
मेरी सुबहों को महकाकर,
नन्हीं सी रौशनी को,
खिड़कियों के परदे खिसकाकर,
चुहचुहाती हो हल्के,
संगीत के देते हुए मधुर स्वर,
तुम वही हो जो,
कभी पिछले दरवाज़े पर,
दस्तख देती हो,
फिर बताती हो अक्सर,
रास्ते सभी, आगे पीछे के,
देखने चाहिए, झाँक कर,
देख लेना चाहिए,
हर बार, या फिर बार बार,
की दरवाज़े अभी बंद,
तो नहीं हुए हैं, जंग खाकर,
तुम वही हो जो,
शाम को, सुबह को, ख़ासकर,
जब मैं घिर जाता हूँ,
अपने से ही, बहुत बहुत अंदर,
बिना बताये आती हो,
ले जाती हो मुझे, खींचकर ।
देखो मुझे जबरदस्ती,
पसंद नहीं, तो क्यों कर,
टाल देती हो तुम मुझे,
हल्के से, मगर मुस्कुराकर ।
तुम वही हो जो,
अनकही बातों को सुनकर
बता देती हो अपनी,
चपल आँखों को मटकाकर,
भर देती हो रोम रोम,
रस अबूझ, मधु सा मधुकर,
तुम वही हो जो,
कहा सुना, मान, मना,
कभी कहकर, कभी बतलाकर,
कुछ पल पतली, हल्की,
ऊँगलियों से हल्के से गुदगुदाकर,
धारा धार, ठहाकों की,
रौशनी में, मस्ती से लहराकर,
बन जाती हो मुझ सी,
मुझको मुझसे ही मिलवाकर ।
तुम वही हो जो,
प्रेम की परिभाषा से परे,
स्वप्न बाँध, नयनों में भरे,
अविलंब मेरे साथ साथ,
चल देती हो, विश्वास,
की एक पतली सी डोर पे,
मेरे जीवन कथा की,
बन जाती हो सूत्रधार,
जो नित् नया ‘सौरभ’ रचकर,
बतलाता सत्य सुंदर,
परिभाषा से परे, परिपोषित,
अनुभूति अभिनव, प्रेम परस्पर ।।

