दरवाज़ों पर पढ़ा था मैंने,
लिखा था, आना तो दिल खोल आना,
जो क़दमों में घबराहट दें,
ऐसी ज़ंजीरों को भी ज़रा खोल आना,
रोज़ रोज़ लौटने का तुम,
कुछ नया बहाना भी अब खोज लाना,
जो बुलाते हो फ़रिश्ते भी,
कहना फ़ुर्सत में और किसी रोज़ आना,
ईद के दिन गले मिलना,
नज़र उठाना, मिलाना, और होश आना,
तुम तिज़ारत को ही सही,
मेरे मिज़ाज, दरमियाँ-ने आग़ोश आना,
ढूँढने पर भी कहीं ना मिलें,
चुपके सोती पलकों को ही खोल आना,
निगाहें भी राज़ नहीं रखतीं,
तुम भी दीवारों से सब कुछ बोल आना,
असबाब खुली हवा में तुम,
घर आने से पहले ही सब टटोल आना,
भारी बहुत हैं ये बीती यादें,
खुले आसमान से ज़रा बस तोल लाना,
दुआएँ सब बग़ल में बसीं,
रोज़ बस खिड़कियाँ सारी, खोल आना,
चाँद ये रोज़ रोज़ बढ़ता है,
चाँदनी रातों से मिलना तो ये बोल आना,
तुम्हारी बस हँसी तसव्वुर,
खिलखिलाना गालों पर पुरज़ोर आना,
मिलेंगी तुमसे भी ‘सौरभ’,
वो घर में बैठीं हैं, बस बिना शोर आना,

