मुद्दतों से, अभी भी एक आस लिए बैठें हैं ..
होश में हैं, जो तेरी आवाज़ लिए बैठें है..
रुबरू हों तो कशिश और जवाँ हो ‘सौरभ’,
दुआएँ लफ़्ज़ों में कुछ ख़ास लिए बैठे हैं..
भागते क़दमों को मालूम ना चला..
किस दौड़ में, और, किस रस्ते में ले गये,
किताबों सहेज कर रखते थे पास में,
कितने धागों को हम जोड़ बस्ते में ले गए,
चिड़ियों को उड़ाते कर पन्नों पर कभी,
पेंसिलों के टुकड़े, घर बक्सों में ले गए,
तरतीब से बन कर निकले, पहुँचे जहाँ,
‘सौरभ’ पल बिखेरते, किश्तों में ले गए ।।
काग़ज़ों स्याह तर, तेरा नाम लिए बैठे हैं,
जो लिखा नहीं, वो अंजाम लिए बैठे हैं,
चंद लफ़्ज़ों का, फ़ासला है, फिर भी,
हम अपनी साँसों को थाम लिए बैठे हैं ।
इन्तज़ार इतना किया, शाम लिए बैठे हैं,
लब से लगाया ये कभी, मान लिए बैठे हैं
बड़ी मुश्किल से आए दनिश्ता महफ़िल में,
कुछ भी ये नहीं कहते, तूफ़ान लिए बैठें हैं ।
सूखती हुई आँखों में, पैग़ाम लिए बैठे हैं,
ज़िंदगी ज़ब्त हुयी, पर जान लिए बैठे हैं,
लुहान लहू, लब से, ना निकलता फिरे,
दौड़ पाते नसों में, हम लगाम दिए बैठे हैं ।
निशान्त रातों में, संग साज़ लिए बैठे हैं,
गूँजती नदियाँ हैं, हम प्यास लिए बैठे हैं,
इन पथरों ने भी, गाएँ हैं फ़साने अक्सर ,
जो ख़ुद ही सख़्त, मिज़ाज लिए बैठे हैं ।
मुद्दतों से, अभी भी एक आस लिए बैठें हैं ..
होश में हैं, जो तेरी आवाज़ लिए बैठें है..
रुबरू हों तो कशिश और जवाँ हो ‘सौरभ’,
दुआएँ लफ़्ज़ों में कुछ ख़ास लिए बैठे हैं..

