यह शख़्स कौन है जो दीवार में तो रहता है
पर खुले आसमान से बात किया करता है ।
जब मुस्कुराता है तो बादल से निकल कर के
सूरज भी तेरा इस्तक़बाल किया करता है ।
जानते कौन कहाँ ग़ैर हुआ, कौन अपना,
वो झरोखों से हाथ हिला दिया करता है ।
ख़ुशबुओं से अनुराग उसका है ये कैसा,
पेड़ जो फूलों को ही उधार दिया करता है ।
‘सौरभ’ पूछें राजे़-गुलकंद, तो बोले,
इसका भी कोई इश्तेहार दिया करता है ।।

