ऐसी बात कहाँ से लाऊँ,
अब तलक़ जो कही नहीं,
ऐसी कैसी ग़ज़ल सजाऊँ,
जो महफ़िल में चढ़ी नहीं;
आँखे खोले सुनते थे सब,
पलकें ढक सब खो जाते,
कुछ रुमानी सी आहें भरते,
मुक़र्रर कर फिर, दोहराते,
इसरार मुकम्मल पर पाऊँ,
आयत-ए-मुबीं, पढ़ी कहीं
ऐसी कैसी ग़ज़ल सजाऊँ,
जो महफ़िल में चढ़ी नहीं;
वो दरिया कहाँ पर बहता,
जिसपे चढ़ सब बह जाते,
होश में डूबे, चेहरे भी सारे,
छलक छलक सतह आते,
पत्थर दरिया में पिघलाऊँ,
इस क़दर ये बूँदें अड़ी रहीं;
ऐसी कैसी ग़ज़ल सजाऊँ,
जो महफ़िल में चढ़ी नहीं;
किस्सगोयी होती भी ऐसी,
क़िस्से क़िस्सा कह जाते,
नज़्म ज़िंदगी कहती जैसी,
सुनकर वैसी हम दोहराते,
सबसे अब ये ही बतलाऊँ,
क़िस्सों से आगे बढ़ी नहीं,
ऐसी कैसी ग़ज़ल सजाऊँ,
जो महफ़िल में चढ़ी नहीं;
फु़सला कर ले गए वो सारे,
जज़्बात हमारी महफ़िल से,
बहला कर वो गए पुचकारे,
हर रात हमारी महफ़िल से,
बहकों को कितना बहलाऊँ,
‘सौरभ’ जिनपे है चढ़ी नहीं;
ऐसी कैसी ग़ज़ल सजाऊँ,
जो महफ़िल में चढ़ी नहीं;

