वो माँ कहलाती

वो ख़ून की लकीरें,

आवाज़ें और चीख़ें,

नसों का ताना जाना,

जिस्म को फाड़ पाना,

हड्डियों की जकड़न,

मस्तिष्क की उलझन,

मुट्ठियों को भींचकर,

दाँतों को मींच मींचकर,

आँखों का बाहर आना,

साँसों का रुक सा जाना,

जिस्म से जो ढकेला,

जीवन का एक रेला,

दर्द से भी उलझकर,

मुस्कुरायी, बरसकर,

पसीने में बहती जाती,

कलेजे से ‘माँ’ कहाती ।।

 

वो गोदी में छुपाकर,

सींचती हैं, बचाकर,

ऊनींदी होती जातीं,

पर लोरियाँ बनातीं,

हाथों को पकड़ कर,

आँखों को समझकर,

डर से निडर बनातीं,

दिशा नयीं दिखातीं,

गिर जाने पर उठातीं,

उठ जाने पर बिठातीं,

गल जातीं, संग गलातीं

ढलतीं पर ढाल जातीं,

ग़ुस्से में जो मुस्कुरातीं,

‘सौरभ’ वो ‘माँ’ कहातीं ।।


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