मेरे पल पल का हिसाब लेता है,
जब भी चाहे, वो बाँट लेता है,
वक़्त, आज भी मिला था मुझसे,
पूछा मुझको तू कैसे काट लेता है ।
मेरे माथे की शिकन है, या फिर,
कुछ लकीरों ने ही खेल खेला है,
कुछ समय की, नज़दीकियाँ भी
उम्रभर का मानो तो साथ देता है।
सुबह की हर रोज़ की दस्तखत पर,
कभी ख़याल में, या किसी ख़त पर,
अब भी दोस्तों का देख के चेहरा,
‘सौरभ’ तो ज़िंदगी को नाप लेता है ।

