थोड़ी मासूमियत बचा के रख लीजिए ,
डाके बहुत अभी पड़ने वाले हैं,
धड़कने गिनने का था यह हक़ जिनको,
वो दिलों पर अब चढ़ने वाले हैं,
मेरे हर एक क़सीदे की रजा़ है जिनको,
वो मेरे चेहरे को पढ़ने वाले हैं,
मेरे माथे की लकीरों को, पता ना चला,
कब पेशानि पे बल पड़ने वाले हैं,
हम ही आए थे गोशे में, ज़ुनून था अपना,
अब क्या जो, बिछड़ने वाले हैं,
हाथ जो अब तक सकूने-शाबाशी थे, वो,
हाथ गिरेबाँ को पकड़ने वाले हैं
बच्चे कितने खेलते हैं अभी, मैदाने-दिल में,
क्या उम्र से भी, ये बढ़ने वाले हैं?
मैंने फैला के रिश्तों की दुकान लगायी थी,
ये ख़रीदार भी सिकुड़ने वाले हैं,
खोल कर रखने को सब तैयार हैं, ‘सौरभ’
मेरे राज़, जो वही गढ़ने वाले हैं ।।

