रूबरू हुए, तो पूछेंगे होश से

रूबरू जब भी हुए, तो पूछेंगे होश से,

जब भी मिलीं निगाहें, क्यूँ हम बेहोश थे,

नशा है ये कैसा आपके, दीदारे-हुस्न में,

चेहरे से कह गए, ज़ुबान से ख़ामोश थे ।

 

क्यों आप ही है क्या, क़ातिल मिज़ाज के?

छुरियाँ, कटार रखते हैं, बड़े ही लिहाज़ से?

होंठों को जो मिलाते, मुकम्मल इस क़दर,

ख़ुदा क्यों बुलाए, ख़ुद ही जायें जोश से ।

 

मंदिरों में, मस्जिदों में, है ये इंतज़ार क्यों,

तुझसे मिला नहीं, फिर भी, बेक़रार क्यों,

क्या इश्क़ है ख़ुदा से, या ख़ुदगर्ज़ी तेरी,

ख़ुद को ख़ुद के नहीं, जाता है आग़ोश में ।

 

जब तुही मेरा ख़ुदा, तो कोई दयार क्यों,

जब मिल गया है तू, तो कोई गुहार क्यों,

ऐ बदसूरती के लिहाफ़ में छिपी ज़िंदगी,

सुना है तू सुनती है मुझे, बड़े ही होश से ।

 

लब्बो-लुआब कैसा, सब लोग हैं मानते,

जिस राह जब चले, सब उसे ही जानते,

मिलती तो मुझसे ज़िंदगी है बेहिसाब सा,

‘सौरभ’ कहते हैं, वो नहीं रहते हैं, रोज़ से ।।

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