दुनिया के रंग देख, क्यों तू दंग है?

यही तो इस दुनिया का रंग है,

इसको देख कर क्यों तू दंग है,

कभी चेहरे, कभी दिल पर चढ़ी,

उड़ती फिरे, छिपती एक तरंग है।

 

कभी तेरे साथ में थीं, दूरियाँ जो

वही अब तलक बसी मेरे संग है,

नज़दीक खींच कर के छोड़ी है,

ज़िंदगी! तू ये उड़ चली पतंग है ।

 

दोस्त! अपना भी मिज़ाज तू बता,

मन में उठती तेरे क्या क्या उमंग है।

अपनी ख़ैरख्वाह मैं बताऊँ क्या,

मेरी तो ख़ुदमिज़ाजी से ही जंग है ।

 

बहुत नज़दीक से देखता है क्यों,

नज़र तेरी, क्यों इस क़दर तंग है ।

क़रीबियों के मतलब कुछ भी नहीं,

दिलों के दरवाज़े, आज भी बंद हैं ।

 

जाकर उनसे पूछो भी मनसब मेरा,

जो बताते है की वो मेरे अंतरंग हैं ।

ढूँढता फिरता हूँ खिड़कियाँ मैं भी,

उन दीवारों में, जो की हवाबंद हैं ।

 

होंठों के बयान, आँखें हैं सींचती,

क़ातिल ज़ुबान की, हर बात तंज है ।

ग़ौर से देख लेंगे, एक बार फिर तुझे,

नशतरे-हिजाब में, छुपे कयी रंग हैं ।

 

हुनर चेहरे बदलने का, जनाब का

क्या बताएँ कि वो कितने हुनरमंद है,

मुस्कुरा के मैंने ऐहतराम कर लिया,

‘सौरभ’ को पता है, वो किसके संग हैं ।

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