रंग सर चढ़ कर बोलते हैं,
कभी गुलाबी करके टटोलते हैं,
कभी नीला कर जिस्म घोलते हैं,
कभी पीले हो बसंत से झूमते हैं,
कभी लाल कर के धरा, डोलते हैं,
यह रंग, जब सर चढ़ कर बोलते हैं…
बैंगनी बेलियाँ से चमक जाते हैं,
जैसे गुलमोहर से दमक जाते हैं,
खिले हुए सुनेहरे पत्तो से, चढ़ कर,
भूरी भूरी टहनियों से उतर जाते हैं,
ये हरे हरे, मनभरे, उल्लास घोलते हैं,
यह रंग, जब सर चढ़ कर बोलते हैं…
रंग, कभी कभी, बड़े गहरे भी होते हैं,
परत, दर परत, चढ़े चेहरे भी होते हैं,
लाल, नीले से मिल, सफ़ेद झूठ मिला,
रंगीन कथाकार, बड़े बेहरे भी होते हैं,
उनके सप्तरंग, इंद्रधनुष, पर डोलते हैं..
यह रंग, जब सर चढ़ कर बोलते हैं…
विराग पे अनुराग के रंग आते जाते हैं ,
मनचाह से मनस्याह रस्ते बतलाते हैं ,
रंग वही जो बच्चों की पिचकारी में,
निश्छल, मलंग से, छिपते, बरसाते हैं
‘सौरभ’ आसमाँ में ये हवा को तोलते हैं,
यह रंग, जब भी, सर चढ़ कर बोलते हैं…

