विस्तार मेरे जीवन का

बन संग सखी कब आयी,

प्रिये प्रीत प्रभा, होके प्रखर ,

मन मानस, मणि बन छायी ।

सुप्त सदा, जो साध्य न था,

प्रस्तर वह, जो आराध्य न था,

प्राण प्रतिष्ठा प्रति प्रेम परत,

जग जीवन ज्योति जगा आयी ।

धर्ष धीर धर्षण, ध्वज वरण,

अति उद्दवलित, उत्तंग भवन,

धर्मचर्या धर्मिणि, मन आँगन,

कर अनुष्ठान, कर किसलायी ।

जातश्रम जबभी, जीवन जान,

ठठरी पर ठाठ ठहरा, यह मान,

पंचभूत, पंचामृत सत् पंचबाण,

पंचप्राण प्रिये, प्रतिपल पर्यायी ।

आलिंगन हो हर एक मधुपल,

संजीवन हो सदा सत्य प्रबल,

सिंधु सींच कर यह मरुस्थल,

‘सौरभ’ हरियाली कब आयी ?

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