बंदूक़ें बोलतीं हैं
शोर मत करो..
सन्नाटा संगीनों के
रहम पर गूँजता है अभी..
तबलों की थाप पर,
मचलता था जो गीत,
लोहे के क़दमताल
पर चुप रूँधता है अभी …
उबल जाता है,
ठंडी रगों का ज़ुनून,
दौड़ता फिरता था
बेख़ौफ़ गलियों में कभी ..
बहुत करता है,
गुज़ारिश, क़त्ल कर,
बरबस, क़त्ल होती,
उसकी नज़ीरे- रूह तभी ..
अमन सन्नाटा परस्त
संगीनों में नहीं होता,
होता है बख़्तरबंद
के पीछे, सीनों में कहीं …
बड़ा मुश्किल है,
समझना दबे शोर को,
आँखों से झाँकतें हैं,
जो ज़ुबान से कहे नहीं..
समझना ज़्यादा,
ख़ुद को हर एक दफ़ा,
जब बाज़ुओं में ज़ोर,
फड़कता जाता हो कहीं..
और जानना ये,
कोशिशें रूठने नहीं देंगी,
हमको हमसे और तुमसे,
मिलें जो हम एक बार भी ..
लोहे की ज़ंजीर,
पुल बनाने के काम आती,
वो अब रिश्ते जोड़ती हैं
क्योंकि बेड़ियाँ नाकाम रहीं..
इतना मुश्किल नहीं,
हिम के अंश का पत्थर से,
पानी बन प्यास को मिटाना,
वो प्यास बरसों तलक बुझीं..
संगीनों से संगीत,
सुर को समझना, मिलाना,
तराना सजाना, गुनगुनाना,
कहकहों से गूँजना ये ज़मीं …
शोर से सराबोर,
बाज़ारों का ऊँचा चहकना,
बच्चों का बेबाक़ बहकना,
नायाब क़ुदरत का महकना,
नयी जवानियों का चमकना,
नायब का नायाब ये करिश्मा,
शोर है ‘सौरभ’
हर ओर पर मन में नहीं
बंदूके क्योंकि बोलतीं नहीं …

