अम्बर आज,विस्तार बहो उस कारण, इस धार अहो।

अम्बर आज,विस्तार बहो

उस कारण, इस धार अहो।

चंद्र दिवाकर, तेरे भूषण

नव नलिनी, कंचन, कण-कण,

रस माधुरी, मेघ, मयार१ बढ़ो ।।

अम्बर आज..

लवण लूतरा२, लम्पट बादल

मचल चूमता, धरती आँचल

धारा अति अवधार बहो

अम्बर आज..

तृप्त धरा हो, मुक्त ज़रा हो

जीवन पोषिणी, वसुन्धरा हो

तुम जीवन उपहार बनो,

अम्बर आज..

तन ढकने को, मिला आवरण

मन ढकना, तो मधुर आचरण

तुम मन दर्पण सार करो..

कहाँ शुरू और अंत कहाँ है

मुक्त व्यथा का मंत्र कहाँ है

मन से मन विस्तार कहो..

अम्बर आज..

पंथ पथिक, परिवर्तन माँगे

राह कठिन यह, संश्रयण माँगे

अपनी करुणा सार सहो..

अम्बर आज ..

सद् पवन अभिनंदन, जो छूती है

‘सौरभ’ प्रेमालिंगन, अनुभूति है

व्योमित धरती साथ यथो:

अम्बर आज……

१ कृपालु, दयावान

२ नटखट

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