Poems

कजरी के जैसी शाम हुई

कजरी के जैसी शाम हुई, दोपहर भी उसके नाम हुई, भर आयी आँख गगन की, बदरी बिखर के तमाम हुई,

अम्बर आज,विस्तार बहो उस कारण, इस धार अहो।

अम्बर आज,विस्तार बहो उस कारण, इस धार अहो। चंद्र दिवाकर, तेरे भूषण नव नलिनी, कंचन, कण-कण, रस माधुरी, मेघ, मयार१

बहुत बहुत ईद मुबारक!!

दरवाज़ों पर पढ़ा था मैंने, लिखा था, आना तो दिल खोल आना, जो क़दमों में घबराहट दें, ऐसी ज़ंजीरों को

छू आयी है…..

छू आयी है उन कणों को, जो गहरे छिपे हुए सुरम्य, नरम से आकाश में बहते, कभी ललिमा के से

मेरा सरमाया हुआ

रात में रौशनी से नहाया हुआ, महताब भी है, क्या शर्माया हुआ, मिले जो हमनवा रात रास्ते पे, बचपना काँधे

अब तो कहने को बस, ये ही अदब है

तुम पियो तो जानिब, मेरे होश गुमाँ, ख़ुश्क होती हुई, साँसो को तलब है,   तुम्हारे तर लबों पर, मिलतीं

मैं और मेरी तन्हाई

मैं और मेरी तन्हाई .. अक्सर ये बातें करते हैं.. तुम होती तो ऐसा होता तुम होती तो वैसा होता

मशालों को जगाना आसान न था

मशालों को जगाना, आसान तो न था, इन तूफानों में रौशनी को बचाऊं कैसे ? तंग गलिओं से गुजरते हैं

दोस्ती का चश्मा चढ़ा लिया

लो भाई   दोस्तों ने बिगाड़ कर हर बार, ये कहा; इसके सुधरने का अब सवाल ही कहाँ ?  

बंदूके क्योंकि बोलतीं नहीं

बंदूक़ें बोलतीं हैं शोर मत करो.. सन्नाटा संगीनों के रहम पर गूँजता है अभी.. तबलों की थाप पर, मचलता था

लगाम दिए बैठे

मुद्दतों से, अभी भी एक आस लिए बैठें हैं .. होश में हैं, जो तेरी आवाज़ लिए बैठें है.. रुबरू

नभ विचरित

स्मिता यत्र नभ विचरित, व्योम विभाकर आनंदित, अरुणिम आभा चित्रप्रभा, पंख पसारे प्रफुल्ल प्रद्, प्रपुष्पित हो देवाय पुंज, किलकिलाती काय