कजरी के जैसी शाम हुई
कजरी के जैसी शाम हुई, दोपहर भी उसके नाम हुई, भर आयी आँख गगन की, बदरी बिखर के तमाम हुई, तड़पें अंदर, अगन समंदर, बह भी ना; पाए पिघलकर, ऐसे प्रीत उबल के निकली मेघा धुल गयी, तमाम हुई, गगन भी तो छितरा छितरा, बिन बदरी, बिखरा बिखरा, कब आएगी, बह जाने को, छत ओढ़ […]

