लगाम दिए बैठे
मुद्दतों से, अभी भी एक आस लिए बैठें हैं .. होश में हैं, जो तेरी आवाज़ लिए बैठें है.. रुबरू हों तो कशिश और जवाँ हो ‘सौरभ’, दुआएँ लफ़्ज़ों में कुछ ख़ास लिए बैठे हैं.. भागते क़दमों को मालूम ना चला.. किस दौड़ में, और, किस रस्ते में ले गये, किताबों सहेज कर रखते […]

