Poetry

लगाम दिए बैठे

मुद्दतों से, अभी भी एक आस लिए बैठें हैं .. होश में हैं, जो तेरी आवाज़ लिए बैठें है.. रुबरू हों तो कशिश और जवाँ हो ‘सौरभ’, दुआएँ लफ़्ज़ों में कुछ ख़ास लिए बैठे  हैं..   भागते क़दमों को मालूम ना चला.. किस दौड़ में, और, किस रस्ते में ले गये, किताबों सहेज कर रखते […]

नभ विचरित

स्मिता यत्र नभ विचरित, व्योम विभाकर आनंदित, अरुणिम आभा चित्रप्रभा, पंख पसारे प्रफुल्ल प्रद्, प्रपुष्पित हो देवाय पुंज, किलकिलाती काय कुंज, लालायित मुग्ध लावण्या, ललित लताभूषण मड़ियाँ, प्रथम प्रहर फहर छितरायी, आरम्भ आरोहिणी दिव्यायी, मधुरित मंचन मनोरमा, स्वाधीन धर्म उत्प्रेरणा, पीयूख परमहत वरदायी, मुदित मायावनी मुस्कायी, दाक्षिण्य दिव्य दशांग मय, आवाहन अभिजात्य अभय, ‘सौरभ’ निर्मल […]

क्या क्या सहते रहे हो

सरकार कोई हो, मिज़ाज वही हो हथेली पर सरसों, की बात वही हो बिकना आए तो आओ बिको तुम, यह भर देखो की बस दाम सही हो,   हमें आज चौपाल पे ग़ुस्सा बड़ा है , फिर कैसे कैसों से, पाला पड़ा है, जो उम्मीद थी की वो कुछ सुनेंगे, वही आकर बोले, आवाज़ ‘नहीं’  […]

विस्तार मेरे जीवन का

बन संग सखी कब आयी, प्रिये प्रीत प्रभा, होके प्रखर , मन मानस, मणि बन छायी । सुप्त सदा, जो साध्य न था, प्रस्तर वह, जो आराध्य न था, प्राण प्रतिष्ठा प्रति प्रेम परत, जग जीवन ज्योति जगा आयी । धर्ष धीर धर्षण, ध्वज वरण, अति उद्दवलित, उत्तंग भवन, धर्मचर्या धर्मिणि, मन आँगन, कर अनुष्ठान, […]

हे नीलकंठ

हे नीलकंठ, योगेश, महेश, हे दिव्यमान, अर्धनारीश्वर, हे त्रिशूलधारी, त्रिलोकिनरेश, हे चंद्रधारी, तुम जो धूधेश्वर, कित् कारण, हो तुम मृत्युंजय, तुम अमरनाथ, हो अनादि अमर, दिशा दिखाओ सत्य, अभय, कंठ सर्पमाल्य, तृष्णा आतुर, निर्भय निर्वाण के, हे! निर्माता, मोक्ष विधान के हे! रचनाकर, कित् विधि, ज्योति अख्याता, अलख, दीप्त, हे ! अभ्यंकर, चित् प्रमाद, है […]

प्रेम परिभाषा के परे

प्रेम परिभाषा के परे रोज देखता हूँ, कभी दबे पाँव आकर, चुपके से मेरी आँखों को अपनी हथेलियों में छिपाकर, मासूम सा पूछता है, ख़ुद को महसूस कराकर, बता मैं कौन हूँ ? मैं भी कहता हूँ मुस्कुराकर, तुम.. तुम वही हो जो रोज़, मेरी सुबहों को महकाकर, नन्हीं सी रौशनी को, खिड़कियों के परदे […]

पल पल चला

बूँद बूँद पकड़ी, खड़ा हो गया, पँख लगा कर, बड़ा हो गया, प्यास बुझाता, घड़ा हो गया, अंकुर जड़ों पर खड़ा हो गया, वो कभी आँगन, बइयाँ चला, दुलारा, माँ की कनैय्याँ पला, पल पल चला, पल पल पला, पालकों पे पाला, ये चुलबुला, लहरा,फहरा, श्वेतांबर आँचल, लुकता छिपता, नटखट बादल, चित मन आतुर, अतिशय […]

रंग सर चढ़ कर बोलते हैं

रंग सर चढ़ कर बोलते हैं, कभी गुलाबी करके टटोलते हैं, कभी नीला कर जिस्म घोलते हैं, कभी पीले हो बसंत से झूमते हैं, कभी लाल कर के धरा, डोलते हैं, यह रंग, जब सर चढ़ कर बोलते हैं…   बैंगनी बेलियाँ से चमक जाते हैं, जैसे गुलमोहर से दमक जाते हैं, खिले हुए सुनेहरे […]

दुनिया के रंग देख, क्यों तू दंग है?

यही तो इस दुनिया का रंग है, इसको देख कर क्यों तू दंग है, कभी चेहरे, कभी दिल पर चढ़ी, उड़ती फिरे, छिपती एक तरंग है।   कभी तेरे साथ में थीं, दूरियाँ जो वही अब तलक बसी मेरे संग है, नज़दीक खींच कर के छोड़ी है, ज़िंदगी! तू ये उड़ चली पतंग है । […]

गर्भ से जीवन साध लिया

गर्भ से जीवन साध लिया; सृष्टि से सीधा संवाद किया, पीड़ा पराकाष्ठ, जब उभरी, धरती सा संयम बांध लिया;   पंकजा ! रचियता, तू उपवन, विहारिणी वरण तू कण कण,    ज्योति जिव्या, आरती, रमण तूने वसुधा को है साध्य जिया;   आरोहिणी अरुण बेला की, निशा बिछा कर डोला की, वरुणाई होकर जोअकुलाई, करुणा से […]