Poetry

प्रकृति का सार

चलो बनाएँ .. जो बहती बिना थकान, स्वच्छ हवा लिए मुस्कान, चिड़ियों की ऊँची उड़ान, साफ़ सा खुला आसमान..   चलो बनाएँ .. बुलबुल चहकती हर सुबह, कोयल गाती हो तरह तरह, फलों से झुका, लदा भरा, पेड़ ऊँचे पर हर पत्ता हरा..   चलो बनाएँ …. हिम से पूरा छिपा ढका, सफ़ेद दूध जिससे […]

घर की दीवारी

भीतर अंदर घर की दीवारी, दुबक के बैठा, सपना भारी, दोनों घुटनों के दरमियाँ में, सिसकतीं सांसें, बारी बारी I   तुम बतलाते, आस बड़ी है, जीवन छोटा, प्यास बड़ी है, नन्ही कलाई, जान न पायी, कुआँ है गहरा, गगरी भारी I   भीतर अंदर, घर की दीवारी,…   चारों पहर, ताक को ताके, अगल […]

चलो ज़रा, चमन चुराएँ

चलो ज़रा सा, चमन चुराएँ.. ना मेरे मन का, ना तेरे मन का, जो सबका है, वो गगन छुड़ाएँ.. चलो ज़रा सा, चमन चुराएँ…   बादलों, क्यों बरस लगे हैं, कयी हैं जो कि तरस रहे हैं, बूँद बूँद भी ना, बरस रहे हैं, जो हो सके तो गगन चुआएँ, चलो ज़रा सा, चमन चुराएँ.. […]

वो माँ कहलाती

वो ख़ून की लकीरें, आवाज़ें और चीख़ें, नसों का ताना जाना, जिस्म को फाड़ पाना, हड्डियों की जकड़न, मस्तिष्क की उलझन, मुट्ठियों को भींचकर, दाँतों को मींच मींचकर, आँखों का बाहर आना, साँसों का रुक सा जाना, जिस्म से जो ढकेला, जीवन का एक रेला, दर्द से भी उलझकर, मुस्कुरायी, बरसकर, पसीने में बहती जाती, […]

सही और गलत को नापता हूँ

सही और ग़लत के बीच; नापता हूँ, तो फ़ासला नहीं मिलता, मिलता है तो बस कि हवा किस ओर को बह रही है, किस तरफ़ से रूख कर के, कौन सी उम्मीदों के साथ, जी रहा हूँ मैं, ये पूछते हुए, रात अभी कितनी और गहरी है, झूठ और सच के पास में, कितने गवाह […]

ख़ूबसूरती तो काफ़िर ही कहलाएगी

ग़ौर से देखो तो फिर नज़र आएगी, दरमियाँ दफ़्न है, क्यों दिखलाएगी; ख़ूबसूरती तो काफ़िर ही कहलाएगी, जो बचा के ख़ुद को ही रख पाएगी; जो हुज़ूर के हुज़रे में पड़ा हो हरदम, उसके अंदर भी जुदाई ही नज़र आएगी; जो वो चेहरे के लकीरें ही पढ़ा करते हैं, ‘सौरभ’ कब ग़ुबार मेरा समझ पायेंगी […]

वो दरिया कहाँ बहता

ऐसी बात कहाँ से लाऊँ, अब तलक़ जो कही नहीं, ऐसी कैसी ग़ज़ल सजाऊँ, जो महफ़िल में चढ़ी नहीं;   आँखे खोले सुनते थे सब, पलकें ढक सब खो जाते, कुछ रुमानी सी आहें भरते, मुक़र्रर कर फिर, दोहराते, इसरार मुकम्मल पर पाऊँ, आयत-ए-मुबीं, पढ़ी कहीं   ऐसी कैसी ग़ज़ल सजाऊँ, जो महफ़िल में चढ़ी […]

वो फिर से बुलाते हैं हमको

वो फिर से बुलाते हैं हमको.. कुछ मीठे बोलों वाले गाँव, ठंडी नीम की हिलती छाँव, तालाब में बहती चप्पू नाँव, सुबह शाम बस चाँव-चाँव, काग़ज़ी रिवाल्वर ठाँव-ठाँव, गिलहरी से फुदके नंगे पाँव, भारी दोपहरी, शीतल गाँव वो फिर से बुलाते हैं हमको..   वो फिर से बुलाते हैं हमको.. भागम भाग, पकड़म पकड़ाई, ऊँचम […]

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