Poems

  • April 8, 2019
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लगाम दिए बैठे

मुद्दतों से, अभी भी एक आस लिए बैठें हैं .. होश में हैं, जो तेरी आवाज़ लिए बैठें है.. रुबरू हों तो कशिश और जवाँ

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  • April 5, 2019
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नभ विचरित

स्मिता यत्र नभ विचरित, व्योम विभाकर आनंदित, अरुणिम आभा चित्रप्रभा, पंख पसारे प्रफुल्ल प्रद्, प्रपुष्पित हो देवाय पुंज, किलकिलाती काय कुंज, लालायित मुग्ध लावण्या, ललित

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  • April 5, 2019
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क्या क्या सहते रहे हो

सरकार कोई हो, मिज़ाज वही हो हथेली पर सरसों, की बात वही हो बिकना आए तो आओ बिको तुम, यह भर देखो की बस दाम

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  • April 5, 2019
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विस्तार मेरे जीवन का

बन संग सखी कब आयी, प्रिये प्रीत प्रभा, होके प्रखर , मन मानस, मणि बन छायी । सुप्त सदा, जो साध्य न था, प्रस्तर वह,

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  • April 5, 2019
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हे नीलकंठ

हे नीलकंठ, योगेश, महेश, हे दिव्यमान, अर्धनारीश्वर, हे त्रिशूलधारी, त्रिलोकिनरेश, हे चंद्रधारी, तुम जो धूधेश्वर, कित् कारण, हो तुम मृत्युंजय, तुम अमरनाथ, हो अनादि अमर,

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  • April 5, 2019
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प्रेम परिभाषा के परे

प्रेम परिभाषा के परे रोज देखता हूँ, कभी दबे पाँव आकर, चुपके से मेरी आँखों को अपनी हथेलियों में छिपाकर, मासूम सा पूछता है, ख़ुद

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  • April 5, 2019
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पल पल चला

बूँद बूँद पकड़ी, खड़ा हो गया, पँख लगा कर, बड़ा हो गया, प्यास बुझाता, घड़ा हो गया, अंकुर जड़ों पर खड़ा हो गया, वो कभी

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  • April 5, 2019
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रंग सर चढ़ कर बोलते हैं

रंग सर चढ़ कर बोलते हैं, कभी गुलाबी करके टटोलते हैं, कभी नीला कर जिस्म घोलते हैं, कभी पीले हो बसंत से झूमते हैं, कभी

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  • April 5, 2019
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दुनिया के रंग देख, क्यों तू दंग है?

यही तो इस दुनिया का रंग है, इसको देख कर क्यों तू दंग है, कभी चेहरे, कभी दिल पर चढ़ी, उड़ती फिरे, छिपती एक तरंग

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  • April 5, 2019
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गर्भ से जीवन साध लिया

गर्भ से जीवन साध लिया; सृष्टि से सीधा संवाद किया, पीड़ा पराकाष्ठ, जब उभरी, धरती सा संयम बांध लिया;   पंकजा ! रचियता, तू उपवन,

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