- Poetry
- April 8, 2019
लगाम दिए बैठे
मुद्दतों से, अभी भी एक आस लिए बैठें हैं .. होश में हैं, जो तेरी आवाज़ लिए बैठें है.. रुबरू हों तो कशिश और जवाँ
मुद्दतों से, अभी भी एक आस लिए बैठें हैं .. होश में हैं, जो तेरी आवाज़ लिए बैठें है.. रुबरू हों तो कशिश और जवाँ
सरकार कोई हो, मिज़ाज वही हो हथेली पर सरसों, की बात वही हो बिकना आए तो आओ बिको तुम, यह भर देखो की बस दाम
बन संग सखी कब आयी, प्रिये प्रीत प्रभा, होके प्रखर , मन मानस, मणि बन छायी । सुप्त सदा, जो साध्य न था, प्रस्तर वह,
प्रेम परिभाषा के परे रोज देखता हूँ, कभी दबे पाँव आकर, चुपके से मेरी आँखों को अपनी हथेलियों में छिपाकर, मासूम सा पूछता है, ख़ुद
रंग सर चढ़ कर बोलते हैं, कभी गुलाबी करके टटोलते हैं, कभी नीला कर जिस्म घोलते हैं, कभी पीले हो बसंत से झूमते हैं, कभी
यही तो इस दुनिया का रंग है, इसको देख कर क्यों तू दंग है, कभी चेहरे, कभी दिल पर चढ़ी, उड़ती फिरे, छिपती एक तरंग
गर्भ से जीवन साध लिया; सृष्टि से सीधा संवाद किया, पीड़ा पराकाष्ठ, जब उभरी, धरती सा संयम बांध लिया; पंकजा ! रचियता, तू उपवन,