- Poetry
- April 4, 2019
प्रकृति का सार
चलो बनाएँ .. जो बहती बिना थकान, स्वच्छ हवा लिए मुस्कान, चिड़ियों की ऊँची उड़ान, साफ़ सा खुला आसमान.. चलो बनाएँ .. बुलबुल चहकती
चलो बनाएँ .. जो बहती बिना थकान, स्वच्छ हवा लिए मुस्कान, चिड़ियों की ऊँची उड़ान, साफ़ सा खुला आसमान.. चलो बनाएँ .. बुलबुल चहकती
भीतर अंदर घर की दीवारी, दुबक के बैठा, सपना भारी, दोनों घुटनों के दरमियाँ में, सिसकतीं सांसें, बारी बारी I तुम बतलाते, आस बड़ी
चलो ज़रा सा, चमन चुराएँ.. ना मेरे मन का, ना तेरे मन का, जो सबका है, वो गगन छुड़ाएँ.. चलो ज़रा सा, चमन चुराएँ…
वो ख़ून की लकीरें, आवाज़ें और चीख़ें, नसों का ताना जाना, जिस्म को फाड़ पाना, हड्डियों की जकड़न, मस्तिष्क की उलझन, मुट्ठियों को भींचकर, दाँतों
सही और ग़लत के बीच; नापता हूँ, तो फ़ासला नहीं मिलता, मिलता है तो बस कि हवा किस ओर को बह रही है, किस तरफ़
ग़ौर से देखो तो फिर नज़र आएगी, दरमियाँ दफ़्न है, क्यों दिखलाएगी; ख़ूबसूरती तो काफ़िर ही कहलाएगी, जो बचा के ख़ुद को ही रख पाएगी;
ऐसी बात कहाँ से लाऊँ, अब तलक़ जो कही नहीं, ऐसी कैसी ग़ज़ल सजाऊँ, जो महफ़िल में चढ़ी नहीं; आँखे खोले सुनते थे सब,
वो फिर से बुलाते हैं हमको.. कुछ मीठे बोलों वाले गाँव, ठंडी नीम की हिलती छाँव, तालाब में बहती चप्पू नाँव, सुबह शाम बस चाँव-चाँव,
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