Poems

क्या क्या सहते रहे हो

सरकार कोई हो, मिज़ाज वही हो हथेली पर सरसों, की बात वही हो बिकना आए तो आओ बिको तुम, यह

विस्तार मेरे जीवन का

बन संग सखी कब आयी, प्रिये प्रीत प्रभा, होके प्रखर , मन मानस, मणि बन छायी । सुप्त सदा, जो

हे नीलकंठ

हे नीलकंठ, योगेश, महेश, हे दिव्यमान, अर्धनारीश्वर, हे त्रिशूलधारी, त्रिलोकिनरेश, हे चंद्रधारी, तुम जो धूधेश्वर, कित् कारण, हो तुम मृत्युंजय,

प्रेम परिभाषा के परे

प्रेम परिभाषा के परे रोज देखता हूँ, कभी दबे पाँव आकर, चुपके से मेरी आँखों को अपनी हथेलियों में छिपाकर,

पल पल चला

बूँद बूँद पकड़ी, खड़ा हो गया, पँख लगा कर, बड़ा हो गया, प्यास बुझाता, घड़ा हो गया, अंकुर जड़ों पर

रंग सर चढ़ कर बोलते हैं

रंग सर चढ़ कर बोलते हैं, कभी गुलाबी करके टटोलते हैं, कभी नीला कर जिस्म घोलते हैं, कभी पीले हो

दुनिया के रंग देख, क्यों तू दंग है?

यही तो इस दुनिया का रंग है, इसको देख कर क्यों तू दंग है, कभी चेहरे, कभी दिल पर चढ़ी,

गर्भ से जीवन साध लिया

गर्भ से जीवन साध लिया; सृष्टि से सीधा संवाद किया, पीड़ा पराकाष्ठ, जब उभरी, धरती सा संयम बांध लिया;  

वो फिर से बुलाते हैं हमको

वो फिर से बुलाते हैं हमको.. कुछ मीठे बोलों वाले गाँव, ठंडी नीम की हिलती छाँव, तालाब में बहती चप्पू

वो अक्स कहाँ

वो अक्स कहाँ, जो मेरी मुझसे बात करा पाए, वो शख़्स कहाँ, जो बिन बोले कितनी बात बता जाए, पँखों

रूबरू हुए, तो पूछेंगे होश से

रूबरू जब भी हुए, तो पूछेंगे होश से, जब भी मिलीं निगाहें, क्यूँ हम बेहोश थे, नशा है ये कैसा

थोड़ी मासूमियत बचा के रखें

थोड़ी मासूमियत बचा के रख लीजिए , डाके बहुत अभी पड़ने वाले हैं, धड़कने गिनने का था यह हक़ जिनको,